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डिजिटल इमेज वर्गीकरण

डिजिटल इमेज वर्गीकरण 
(Digital Image Classification)


भूमिका (Introduction)
इस अध्याय में डिजिटल इमेज के वर्गीकरण प्रक्रिया का सामान्य परिचय दिया गया है। इस प्रक्रिया में कम्प्यूटर ऑपरेटर निश्चित दशाओं में कम्प्यूटर को इमेज व्याख्या के लिये निर्देशित करता है। इन दशाओं का निर्धारण ऑपरेटर द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
इमेज वर्गीकरण, डिजिटल इमेज व्याख्या की एक तकनीकि है। इसके अतिरिक्त तकनीकियों में लक्ष्यों की पहचान (Object Recognition), दृश्य पुनर्निमाण (Scene Reconstruction ) इत्यादि हैं। इमेज वर्गीकरण सबसे सामान्य महत्वपूर्ण व्यवहारिक तकनीकि है। इमेज वर्गीकरण का उपयोग कई वृहत पैमाने पर क्षेत्रीय इमेज वर्गीकरण के लिये किया जाता है। भारत में कई संस्थाओं द्वारा भूमि उपयोग एवं प्राकृतिक वनस्पति के वर्गीकरण के लिये इस तकनीकी का उपयोग किया गया है। कई राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय संस्थायें तथा सरकार इमेज वर्गीकरण विधि द्वारा संसाधनों की प्रथम सूची तैयार करने में लगी हैं जो कि फील्ड सत्यापन पर आधारित है।
जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है कि इमेज वर्गीकरण कई स्पैक्ट्रल विशेषताओं पर व अलग-अलग है। धरातलीय विशेषताओं पर आधारित होती हैं। यहाँ पर स्पैक्ट्रल डाटा के वर्गीकरण प्रक्रिया पर जोर दिया गया है।
जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है कि इमेज वर्गीकरण कई स्पैक्ट्रल विशेषताओं पर व अलग-अलग है। धरातलीय विशेषताओं पर आधारित होती हैं। यहाँ पर स्पैक्ट्रल डाटा के वर्गीकरण प्रक्रिया पर जोर दिया गया है।

इमेज वर्गीकरण का सिद्धान्त (Principle of Image Clasification)- इसके अंतर्गत सर्वप्रथम डिजिटल आँकड़ों के व्यवस्थित स्थान क्रम (Space) संकल्पना को समझाने का प्रयास किया गया है।
इमेज स्पेस (Image Space)- जैसा कि पूर्व में समझाया एवं दर्शाया गया है कि किसी इमेज के पिक्सलों को 2D क्रम विन्यास में व्यवस्थित किया जाता है। पिक्सल मानों को डिजिटल नम्बर अर्थात DN कहते हैं। इनके मान 0 से लेकर 255 तक होते हैं। DN मान धरातल से परावर्तित या उत्सर्जित ऊर्जा की मात्रा को धरातलीय विभेदन के अनुरूप दर्शाते हैं। इस प्रकार इमेज स्पेस को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है-

"डिजिटल नम्बरों (DN) के धरातलीय वितरण को इमेज स्पेस कहते हैं।"
(The spatial distribution of the DNs defines the image space)
एक बहुस्पैक्ट्रल संवेदक (MSS) किसी धरातलीय विभेदन सैल (GRC) का संसूचन अलग-अलग चैनल में स्पेक्ट्रल बैंड के अनुरूप करता है। संवेदक धरातलीय ऑकड़ों का संसूचन तीन बैंड के अन्तर्गत करता है। कहने का आशय यह है कि एक पिक्सल के तीन DN मानों को पंक्ति एवं कालम में अंकित किया जाता है। 
आकृति स्थान (Feature Space)- जब हम दो बैंड इमेज आँकड़ों की बात करते हैं तो कह सकते हैं कि धरातलीय विभेदन सेल के दो डिजिटल मान हैं। ये दो डिजिटल नम्बर दो आयामी (Dimensional)  विक्टर के तत्व हैं । उन्हें आकृति विक्टर (Feature Vector) V. V,  में दशाया गया है। उदाहरण के लिये आकृति विक्टर के दो मान 13 एवं 55 है जो किसी पिक्सल के दो बैंड के अन्तर्गत अलग-अलग 2 DN हैं। इस एक्टर को दो आयामी या विम ग्राफ से चित्र के अनुसार दर्शाया जाता है। 
इसी प्रकार हम तीन बैंड के आंकड़ों के त्रि-आयामी आकृति विक्टर (V, V, V, ) के सैलों को त्री आगामी ग्राफ से चित्र के अनुसार दर्शा सकते हैं। इस प्रकार आकृति स्थान (FS) की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-
"एक ऐसा ग्राफ जो आकृति विक्टर को दर्शाता है उसे आकृति स्थान या आकृति स्थान प्लाट या विखण्डित प्लॉट कहते हैं।"
(A graph that shows the feature vectors is called a feature space, or feature space plot or scatter plot.)
धरातलीय विभेदन शैल से सम्बन्धित किसी भी आकृति विक्टर के दो या तीन बैंड मानों को भी आकृति स्थान में चित्र  के अनुसार दर्शाया जाता है। दो आयामी आकृति प्लाट अधिक प्रचलित है।


Plotting of the pixel values of a GRC in the feature space for a two-band an three-band image

चार या चार से अधिक आयामी (Dimensional) दशा में भी उपरोक्त संकल्पना ही अपनाई जाती है। ऐसी स्थिति में जब चार या चार से अधिक बैंड के आंकड़ों को संचालित करना होता है तो दो-दो बैंड आंकड़ों के जोड़े बनाकर अलग-अलग रूपों में प्लाट किया जाता है जिसे feature space plot कहते हैं। चार बैंड आंकड़ों को दर्शाने के लिये दो-दो बैंड के छः जोड़े निम्न प्रकार से तैयार किये जाते हैं।

Band I and 2 (i)
Band land 3 (ii)
Band 1 and 4 (iii)
Band 2 and 3 (iv)
Band 2 and 4 (v)
Band 3 and 4 (vi)
विखण्डित प्लाट (Scattered Plot) - इसका आशय अंकीय बिम्ब के भक्ति विक्टर 2D जोड़ों को विखण्डित प्लाट में दर्शाया जाता है। 2D विखण्डित प्लाट पिक्सल मानों के जोड़ों की सूचना प्रस्तुत करता है।

आकृति स्थान में दूरी एवं समूह (Distance And Clusters in the Feature Space)- बिम्ब वर्गीकरण में आकृति स्थान में दूरी  का प्रयोग किया जाता है। इस दूरी का मापन Euclidean distance कहलाता है। दो बैंड आयामी आकृति स्थान में दूरी की गणना पाइथागोरस की प्रमेय के आधार पर की जाती है । इसी प्रकार तीन या इससे अधिक आयामी बैंड के आंकड़ों को भी इसी तरह से प्रदर्शित किया जाता है।
 समूह (Cluster)- समूह से अभिप्राय यह है कि जब धरातल पर किसी तत्व के GRC निश्चित क्षेत्र के एक समूह में फेल होते है तो इसे समूह कहा जाता है। चित्र  में आकृतियों की स्थिति को दर्शाया गया है जिसमें आकृति विक्टर को विशिष्ट भूमि आवरण समूहों, घास, जल, पेड़ों इत्यादि को छ: रूपों में प्रदर्शित किया गया है। इस चित्र से स्पष्ट है कि GRC के अलग-अलग समूहों के अलग-अलग सघन रूपों में प्रदर्शित किया गया है। उदाहरण के लिये जल के GRC सघन समूह को प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार अन्य भूमि आवरण के भक्ति विक्टर भी अलग अलग समूहों में दर्शाये गये हैं। प्रत्येक समूह आकृति स्थान में अपना क्षेत्रफल घेरता है।
बर्ग (Class)- धरातल पर अलग-अलग आकृति विक्टर के समूहों के अलग-अलग वर्ग होते हैं। जिन्हीं अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया जाता है। इसे क्लास या वर्ग कहते हैं। धरातल की विभिन्न आकृतियों को वर्गों में बाँटना बिम्ब वर्गीकरण का अधारभूत सिद्धान्त है। आकृति स्थान में किसी विशिष्टवर्ग द्वारा स्थान घेरा जाता है। यदि आकृति स्थान में कोई वर्ग (Class) एक बार स्पष्ट हो जाता है तो प्रत्येक आकृति विक्टर को दर्शाया जा सकता है। इसी प्रकार बहुबैंड बिम्बों के भक्ति विक्टर को भी प्लाट किया जा सकता है।
स्पेक्ट्रल अन्तर (Spectral Differentiation) - किसी बिम्ब अथवा इमेज वर्गीकरण में धरातलीय आकृतियों के क्लास या वर्ग को अलग-अलग करने के लिये अलग-अलग स्पैक्ट्रल विशेषताओं की नितान्त आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिये इसके लिये स्पेक्ट्रल परावर्तन के वक्रों की तुलना करके विश्लेषण किया जा सकता है। यदि आकृति स्थान में अलग-अलग वर्गों के अलग-अलग समूह नहीं है तो बिम्ब वर्गीकरण में कुछ ही स्तर तक विश्वसनीयता प्राप्त की जा सकती है।
बिम्ब वर्गीकरण का सिद्धान्त यह है कि आकृति स्थान (Feature Space) में समूहों (Clusts) के स्पष्टीकरण से पूर्व तुलना के द्वारा आकृति विक्टर (feature Vector) आधारित किसी पिक्सल का काई क्लास निर्दिष्ट (Assigned) किया जाता है। ऐसा करने से किसी बिम्ब (Image) में सारे पिक्सल  वर्गीकृत हो जाते  है तथा अलग-अलग पिक्सल का एक समह अलग-अलग दृष्टिगोचर होने लगता है। बिम्ब वर्गीकरण का मूल आधार यह है कि समूहों के निर्धारण से पर्व तलना करके वर्गीकृत करना है। इन्हीं  समूह को  परिभाषित करने की आवश्यकता होती है।
समूह की स्पष्टीकरण एक अन्तर सक्रिय प्रक्रिया है जिसे प्रशिक्षण प्रक्रिया (Truining process) में भी चलाया जाता है। समूहों के साथ-साथ व्यक्तिगत पिक्सल के वर्गीकरण की प्रकिया को एल्गोरिथम वर्गीकरण के द्वारा किया जाता है। इसको आगे समझाया गया है।

बिम्ब वर्गीकरण प्रक्रिया (Image Classification Process)
विम्ब वर्गीकरण प्रक्रिया के निम्न 5 विशेष कदम हैं।
1. आंकड़ों का चुनाव (Data Selection)
2. निरीक्षणात्मक एवं अनिरीक्षणात्मक वर्गीकरण (Supervised and Unsupervised Classification)
3. एल्गोरिथ्म का चुनाव (Selection of Algorithm)
4. वर्गीकरण (Classification)
5. वैधानिकता (Validity)

The classification process: the most important component of training in combination with selection of the algorithm

आंकड़ों का चुनाव (Data Selection)- बिम्ब वर्गीकरण की सर्वप्रथम प्रक्रिया सुदूर संवेदन बिम्ब का चुनाव एवं तैयारी करना होता है। इसके लिये सर्वप्रथम यह निर्धारित किया जाता है कि हमें किस वस्तु का वर्गीकरण करना है। यह धरातल पर फैली हुई आकृतियों को आवरण पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिये जल, वनस्पति, मिट्टी, भूमि उपयोग इत्यादि। आंकड़ों के चुनाव से पूर्ण यह देखा जाता है कि किस संवेदक द्वारा उपयुक्त तरंग दैर्ध्य पर उपयुक्त आंकड़ों को प्राप्त किया गया है। संवेदक (Sensor), तरंग दैर्ध्य (Wave Length) तथा विभेदन (Resolution) का आंकड़ों के चुनाव में विशेष ध्यान दिया जाता है।

निरीक्षणात्मक एवं अनिरीक्षणात्मक वर्गीकरण (Supervised and Unsupervised का (Sun Classification)- किसी आकृति स्थान (Feature Space) को आवरण की विशेषताओं के आधार पर अलग-अलग समूहों में विभाजित किया जाता है। इसके लिये मुख्यतः निम्न दो उपागम उपयोग में लाये जाते हैं-
(i) निरीक्षणात्मक (Supervised)
(ii) अनिरीक्षणात्मक (Unsupervised)
निरीक्षणात्मक वर्गीकरण में कोई भी शोधकर्ता परिशिक्षण के दौरान धरातल पर भू आवरण को  अलग अलग समूहों में वर्गीकृत करता है। जैसे कि कृषि भूमि, वन-भूमि, बेकार भूमि या वन भूमि में अलग-अलग प्रजातियों के समूह इत्यादि। इसके पश्चात वह बिम्ब को वर्गीकृत करता है। इसे किसी बिम्ब का निरीक्षणात्मक वर्गीकरण कहते है। इस उपागम में सत्यापन वर्गीकरण से पूर्व में किया जाता है।
अनिरीक्षणात्मक वर्गीकरण कम्प्यूटर संचालक पिक्सल के आधार पर आकृति स्थान में कई समूह को स्पष्ट कर समूह एल्गोरिथ्म का उपयोग करता है जो स्वतः ही पिक्सल मानों के आधार सम्पूर्ण बिम्ब को अलग-अलग समूह में वगावकृत कर देता है। तत्पश्चात अलग-अलग समहों का सत्यापन धरातल पर किया जाता है। इसे ही अनिरिक्षणात्मक वर्गीकरण कहते हैं।

एल्गोरिथम का चुनाव (Selection of Algorithm)- जब किसी आकृति स्थान में एक बार स्पेक्ट्रल क्लास को स्पष्ट कर दिया जाता है तो संचालक या शोधकर्ता यह निश्चित करता है कि प्रत्येक क्लास में कितने पिक्सल निर्धारित किये गये हैं। पिक्सल का निर्धारण अलग-अलग मापदण्डों के आधार पर किया जाता है।

वर्गीकरण करना (Actual Classification)- एक बार परिशिक्षण (Training) डाटा एवं एल्गोरिथ्म स्थापित कर लिया जाता है तो वास्तविक वर्गीकरण किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि DN मानों के आधार पर प्रतिबिम्ब में प्रत्येक वह बैण्ड पिक्सलों को निर्दिष्ट करके अलग-अलग वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।

परिणामों की वैधता (Validity of the Results)- एक बार वर्गीकृत बिम्ब तैयार हो जाता है तो भूमि सत्यापन द्वारा इसकी उत्तमता की जांच सन्दर्भ डाटा की तुलना करके किया जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि कम्प्यूटर पर वर्गीकृत आंकड़ों की भू धरातल पर जाकर जांच की जाती है इसके लिये प्रतिचयन (Sampling) विधि का उपयोग किया जाता है।

बिम्ब वर्गीकरण की तैयारी करना (Preparation for image classification)
बिम्ब वर्गीकरण की तैयारी करने के लिये मुख्यतः निम्न बिन्दुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है (i) विषयक वर्ग (Thematic Class), (ii) डाटा का समय (Data Time), (iii) बैण्ड का चुनाव (Selection of Band)

(i) विषयक वर्ग (Thematic Class) - एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति करता है जो सुदूर संवेदन आंकड़ों को विषयक (Thematic) आंकड़ों में परिवर्तित करता है। विषयक विशेषतायें जैसे कि भूमि आवरण (Land cover), भूमि उपयोग (Land use), मृदा के प्रकार (Soil types) या खनिज प्रकार (Mineral types) कार (Soil खनिज इत्यादि हो सकती हैं जिन्हें विश्लेषण के उपयोग में लाया जा सकता हैं। इस प्रक्रिया में विश्लेषणकर्ता के द्वारा किसी दृश्य परावर्तित मानो की अपेक्षा विषयक विशेषताओं में अधिक रुचि ली जाती है।
विम्ब वर्गीकरण प्रक्रिया के द्वारा वृहत आकार के आंकड़ों को कम करके संग्रह किया जा सकता है, जैसे की बहु स्पेक्टर बैंड के आंकड़ों को एक बैंड बिम्ब फाइल में रखा जा सकता है या परिवर्तित किया जा सकता है। इससे स्थान कम गिरता है। इस प्राकार बिम्व वर्गीकरण की तैयारी से पूर्व विषयक विशेषताओं का आकलन करना आवश्यक है।

(ii) डाटा का समय (Data Time)-वर्गीकरण करने से पूर्व यह ध्यान रखा जाता है कि जो आँकड़े या सूचनायें उपयोग में लाई जा रही हैं उनकी तिथि क्या है विश्लेषण के लिये कौन से काल का डाटा उपयुक्त होगा। इसकी अत्यन्त आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिये माना किसी भू-भाग के भूमि उपयोग प्रका प्रकारों का अध्ययन करना है तो किसी बिम्ब का समय ध्यान में रखकर कार्य प्रारम्भ किया जाता है। फसल वक्र (Crop Cycle), वर्फ आवरण (Snow Cover), वनस्पति आवरण इत्यादि उपयोगों में सुदूर संवेदन आंकड़ों का समय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसी प्रकार सूर्य के प्रदीपन (Illumination) कोण भी समय द्वारा निर्धारित होता है जो धरातल के वस्तुओं को प्रदीप्त करता है। कुछ दशाओं में वहु स्पैक्ट्ूल डाटा सैट (Multi Spectral Data Set) की आवश्यकता होती है जिसके द्वारा परिवर्तन संसूचन (Change Detection) का अनुमान लगाया जाता है।

(iii) बैंड का चुनाव (Selection of Band)-प्राप्त आंकड़ों से कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व उपलब्ध स्पेक्ट्रम बैंड में से किसी उपर्यत बैंड का चुनाव किया जाता है इसका कारण यह है कि लैण्डसेट-5 TM के7 बैंड में से कोई भी बैंड लिया जा सकता है जो आवश्यकता की पूर्ति करता है। ऐसी स्थित मवड सहसम्बन्ध (Correlation) भी किया जा सकता है। यह तभी सम्भव है जब दो बैंड का डाटा लगभग समान हा। उदाहरण के लिये प्राकृतिक वनस्पति के विश्लेषण के लिये रक्त एवं हरे तरंग दैर्ध् (Wave length) बैंडों को आपस में मिलाया जा सकता है। सह सम्बन्धित बैंड, वर्गीकरण के उद्देश्य पूर्ति के लिये (Redundant) प्रचुर मात्रा में सूचनाओं को उपलब्ध कराते हैं।

निरीक्षणात्मक बिम्ब वर्गीकरण (Supervised Image Classification)
निरीक्षणात्मक बिम्ब वर्गीकरण के लिये दृश्य (Scane) का ज्ञान तथा परिशिक्षण सैट होना अतिआवश्यक हैं। विश्व वर्गीकरण का प्रथम चरण यह है कि दृश्य विशेष के आकृतियों में भेद स्थापित कैसे किया जाय। यह कला वर्गीकरण करने वाले संचालक को समझना चाहिए जो कि प्रतिचयित क्षेत्र (Training Area) की सहायता कि प्रति से स्पेक्ट्रम विशेषताओं का वर्गीकरण कैसे किया जाता है। निरिक्षणात्मक वर्गीकरण में यह माना जाता है कि निरीक्षणकर्ता अध्ययन क्षेत्र या चयनित क्षेत्र से भली भाँति परिचित हैं तभी वह उपयुक्त वर्गीकरण कर सकता है। यह तभी सम्भव है जब निरीक्षणकर्ता बिम्व वर्गीकरण का तृतीय चरण प्रशिक्षण सैट का उपलब्ध होना है। किसी विशेष वर्ग के कई परिशिक्षण सैलों की संख्या की है जो कि आकृति स्थान में एक समूह का निर्माण करते हैं। इस समूह (Cluster) में से संचालक परिशिक्षण सैट चुनता है। प्रतिचयन के लिये निम्न बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए-
(i) पहली बात यह है कि जिस वर्ग से प्रतिचयन किया जा रहा है वह दृश्य में उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हो। यद्यपि यह वर्गीकृत एल्गोरिथ्म पर निर्भर करता है जिसका प्रयोग निरीक्षणात्मक वर्गीकरण किया जाता है। इसका नियम 30 x n ( n= बैंड की संख्या) है।
(ii) दूसरा एक चयनिन वर्ग दूसरे वर्ग के ऊपर चढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए। इससे विश्वसनीय विभाजन नहीं माना जाता है। कभी-कभी बहु स्पेक्टर बैंड बिम्बों के कुछ वर्गों में स्पैक्टल अंशछादन होता है जो सिद्धान्तः इमेज वर्गीकरण द्वारा अलग नहीं किये जा सकते हैं इसका समाधान यह है कि कुछ अन्य बैंक के डाटा को मिलाकर नयी इमेज बनाकर कुछ सीमा तक वर्गीकरण प्रक्रिया को सफल बनाया जा सकता है।

अनिरीक्षणात्मक बिम्ब वर्गीकरण (Unsupervised Image Classification)
जैसा कि स्पष्ट है कि निरीक्षणात्मक वर्गीकरण में क्षेत्र का ज्ञान अतिआवश्यक है। यदि यह ज्ञान किसी वर्ग को वर्गीकृत करने में पर्याप्त न हो तो अनिरीक्षणात्मक बिम्ब वर्गीकरण का उपयोग किया जाता है ऐसी स्थिति में क्लस्टरिंग एल्गोरिदम (Clustering Algorithms) का प्रयोग आकृति स्थान में विभिन्न वर्गों को अलग-अलग दर्शाने के लिये किया जाता है। अनिरीक्षणात्मक बिम्ब वर्गीकरण के कई विधियां हैं जिन सबका एक ही उद्देश्य है कि स्पैक्टूल विशेषताओं की समानता के आधार पर अलग-अलग स्पैक्ट्रल समूहों (Groups) को तैयार करना।
इनमें से सबसे प्रचलित उपागम यह है कि प्रयोगकर्ता किसी विम्ब में अधिक से अधिक समूहों का चयन करें। इसके आधार पर कम्प्यूटर उन समूहों के मध्य स्वेच्छानुसार औसत विक्टर (Mean Vector) को स्थापित करें जो कि उस समूह का केन्द्र विन्दु होगा। तत्पश्चात समूह के प्रत्येक सैल को एक नया संख्या निर्दिष्ट की जाती है। संख्या निर्दिष्ट करने का नियम लघुतम दूरी से समूह केन्द्रक (Minimum Distance to Cluster Centroid) है जिसे निर्णय नियम (Decision Rule) भी कहते हैं।
इस नियम के आधार पर एक बार समूह के सभी सैलों को गणना करके एक नया नम्बर निर्दिष्ट किया जाता है। इस प्रक्रिया को तब तक किया जाता है जब तक की किसी समूह का उपयुक्त केन्द्रन मिल जाय और जब तक समूह के सभी सैल सही ढंग से अंकित (Labelled) न हो जाय।

पुनर्वृति प्रक्रिया (iteration Process)- पुर्नवृति प्रक्रिया का अभिप्राय यह है कि Decision rule को कई बार प्रयोग में लाते हैं जब तक वर्गीकरण प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती है। पुर्नवृत्ति प्रक्रिया तब तक नहीं रोकना चाहिए जब तक समूह का केन्द्र बदलना बन्द नहीं होता है। एक बार समूहन प्रक्रिया समाप्त होने के पश्चात अन्तर समूह दूरी के औसत (Mean of Inter Cluster Distance) से समूही की निकटता का विश्लेषण किया जाता है।
विश्लेषण कर्ता का अधिकतम समूहों/वर्गों की संस्था, दो समहों के केन्द्रों की दूरी, समूह का अर्धव्यास तथा अधिकतम सेल संख्याओं को स्पष्ट करना होता है जो कि समहों के विलोमन (Elimination) के लिये द्वार के रूप में कार्य करते हैं। केन्द्र बिन्दु के समीप समूहों की सघनता (Compactness) का विश्लेषण, प्रयोग में लाये गये मानक विचलन के औसत मान द्वारा किया जाता है। यदि समूह लम्बाकार Elongated) है तो समूह को विभाजन लम्बाकार अक्ष (Axis) के ठीक लम्बरूप में होगा। इसी प्राकार समूह की निकटता का विश्लेषण दो समूहों के केन्द्रों के मध्य की दूरी का नापने के द्वारा निकाला जाता है।
यदि दो समूह केन्द्रों के मध्य की दूरी पूर्व में निर्धारित दूरी से कम होती है तो समूहों का विलय होता है। समूहों का अन्तिम स्वरूप अन्तिम पुर्नवृत्ति के सांख्यिकीय गणना के अनुसार आता है। चित्र  में समूह एल्गोरिथ्म के परिणामों को उदाहरण के रूप में परिलक्षित किया गया है इस चित्र में देखा जा सकता है कि आकृति स्पेस में समूहों के केन्द्र उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों के नजदीक में पड़ते हैं ।
इस प्रकार तैयार किये गये समूह सांख्यिकी का उपयोग सम्पूर्ण बिम्ब के बिम्व वर्गीकरण के लिये किया जाता है।

वर्गीकरण एल्गोरिथम (Classification Algorithms)
प्रतिचयनित प्रशिक्षण सैट स्पष्ट तैयार होने के वाद, वर्गीकरण एल्गोरिथम की सहायता से बिम्ब का वर्गीकरण किया जा सकता है बिम्ब वर्गीकरण के कई एलगोरिथम हैं उपयुक्त एलगोरिथम के चुनाव, बिम्ब वर्गीकरण का उद्देश्य (Purpuse), बिम्ब विशेषता तथा प्रशिक्षण डाटा (Training Data) पर निर्भर करता है। कोई भी बिम्ब संचालक (Operator) अपनी आवश्यकतानुसार एलगोरिथम का चुनाव कर सकता है। यहाँ पर निम्न तीन एल्गोरिथम को स्पष्ट किया गया है।
(i) बॉक्स वर्गीकरण (Box Classifier)
(ii) औसत से न्यूनतम दूरी वर्गीकरण (Minimum Distance to Mean Classification)
(ii) अधिकतम संभावित वर्गीकरण (Maximum Likelihood Classifier)

(i) बॉक्स वर्गीकरण (Box Classifiers)- बॉक्स वर्गीकरण सबसे साधारण एवं सरल वर्गीकरण विधि है। यह किसी बिम्ब के प्रत्येक वर्ग की न्यूनतम एवं अधिकतम सीमा को स्पष्ट करता है। किसी वर्ग के न्यूनतम एवं अधिकतम मान उस वर्ग की न्यूनतम और अधिकतम सीमा बनाते है या प्रत्येक वर्ग का औसत एवं मानक विचलन के द्वारा निर्धारित होती हैं। जब कभी भी न्यूनतम एवं अधिकतम सीमा का प्रयोग किया जाता है तो ये आकृति स्पेस में बॉक्स प्रकार के क्षेत्र को दर्शाते हैं। बॉक्सों की संख्या बिम्ब में वर्गों की संख्या पर निर्भर करते हैं जितने वर्ग होते है उतने ही बॉक्स बनते हैं। वर्गीकरण करते समय यह देखा जाता है कि दो बैंड इमेज के आकृति विक्टर किस बॉक्स में पड़ रहे हैं वे जिस बॉक्स में पड़ते है उस बॉक्स का वह एक वर्ग बन जाता है। जो सैल किसी भी बॉक्स में नहीं पड़ता है उसे अनभिज्ञ वर्ग (Unknown Class) निर्दिष्ट किया जाता है। कभी-कभी इसे निष्कासित वर्ग भी कहते हैं।
यद्यपि दोनों डाटा मॉडल धरातलीय आकृतियों के डाटा को अलग-अलग ढंग में संग्रहीत (Storage) करते हैं। परन्तु दोनों ही एक सम्बन्धात्मक डाटा (Relation data base) आधारित के अन्तर्गत संचालित किये जाते हैं। बॉक्स वर्गीकरण में कमी यह है कि यह कि कभी-कभी एक वर्ग दूसरे वर्ग के ऊपर आंशिक रूप से अध्यारोपित हो जाता है। ऐसी दशा में प्रत्येक सैल को स्वेच्छा से मान देना पड़ता है।

(ii) औसत से न्यूनतम दूरी वर्गीकरण (Minimum Distance to Mean)- इसका मुख्य आधार समूह (Cluster) का केन्द्र बिन्दु है वर्गीकरण करते समय इवूनलीडियन दूरी (Euclidean Distance) ज्ञात की जाती है। यह दूरी किसी आकृति विक्टर (Feature Vector) से सभी समूहों के केन्द्र के मध्य गणना करके निकाली जाती है। जिस आकृति विक्टर से इकलीडियन दूरी ली जाती है उसके सैल को एक वर्ग (Class) माना जाता है।
इस वर्गीकरण की कमी यह है कि समह से लम्बी दूरी होने के बाद भी उसी बिन्दु को केन्द्र माना जाता है जो कि वह वास्तविक नहीं होता है।

(iii) अधिकतम सम्भावित वर्गीकरण (Maximum Likelihood Classification)- यह वर्गीकरण द्वारा केवल समूह (Cluster) के केन्द्र को ही नहीं दर्शाया जाता बल्कि समूह को आकृति, आकार तथा दिगविन्यास (Oriantation) का भी विचार वर्गीकरण में किया जाता है। इसको समूह के औसत मान (Mean Value) तथा Covariance Matrix के आधार पर सांख्यिकीय दूरी (Statistical Distance) की गणना करके प्राप्त किया जा सकता है। यह दूरी प्रायः एक सम्भावित मान (Probability Value) ही होती है किसी एक समूह के एक सैल को एक वर्ग मान लिया जाता है जिसकी अत्यधिक सम्भावना व्यक्त की जाती है। अधिकतम सम्भावित वर्गीकरण की मान्यता है कि समूह के सांख्यिकी मान सामान्य (Normal) वितरण का अनुकरण ही करते हैं।
अन्ततः परिणामों की वैधता का आंकलन किया जाता है।

परिणामों की वैधता (Validation of Results)- रास्टर फाइल में बिम्ब वर्गीकरण परिणामों को प्रत्येक राष्ट्र तत्व के अनुसार अलग-अलग वर्गों में चिन्हित किया जाता है। बिम्ब वर्गीकरण के आधार पर वर्गों (Classes) को परिणामों की श्रेणी के अनुरूप प्रतिचयनित (Sampled) कर सत्यापन किया जात है। इसके लिए प्रतिचयन उपागम (Sampling Approach) अपनाई जाती है। इसके अन्तर्गत बिम्ब में वर्गीकृत रास्टर तत्वों की संख्याओं तथा वास्तविक धरातलीय (Field) वर्गीकरण में तुलना की जाती है। सत्याप धरातलीय वर्ग (True world class) को फील्ड निरीक्षण के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। रास्टर बिम्ब से निर्मित वर्गों एवं भू सत्यापित वर्ग में अन्तर Error Matrix के द्वारा की जाती है जिसके अन्तर्गत अलग-अलग शुद्धता मापन की गणना सम्पन्न की जाती है।



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