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समोच्च रेखण (Contouring)
धरातल एवं किसी समतल सतह (level surface) की प्रतिच्छेदन रेखा को समोच्च रेखा (contour) की संज्ञा देते हैं। समोच्च रेखाओं के द्वारा मानचित्र पर किसी क्षेत्र की ऊँचाई-नीचाई अर्थात् धरातल के तरंगों (undulations) को प्रदर्शित किया जाता है। इन रेखाओं से संबंधित आवश्यक बातों को उच्चावच निरूपण के अध्याय में लिखा जा चुका है। प्रस्तुत अध्याय में समोच्च रेखाओं को बनाने की विधियाँ समझायी गई हैं। किसी क्षेत्र का समोच्च रेखी मानचित्र (contour map) बनाने के लिये उस क्षेत्र में दो कार्य किये जाते हैं -(i) धरातल के भिन्न-भिन्न बिन्दुओं की समुद्र तल से ऊँचाइयाँ निश्चित करना एवं (ii) उन बिन्दुओं को सम्बन्धित क्षेत्र के प्लान में अंकित करना । ऊँचाई या समानीत तल ज्ञात करने के लिये डम्पी लेविल, ऐबनी लेविल, भारतीय क्लाइनोमीटर या थियोडोलाइट प्रयोग में लाते हैं। इन उपकरणों की सहायता से समानीत तल ज्ञात करने की विधियों को प्रस्तुत अध्याय में पहले विस्तारपूर्वक समझाया गया है। समानीत तल ज्ञात हो जाने पर इन बिन्दुओं को प्रायः प्लेन टेबल के द्वारा प्लान में अंकित करते हैं। यदि अंकित किये गये बिन्दुओं की ऊँचाइयाँ पूर्व निश्चित अन्तराल (interval) के अनुसार है तो समान ऊँचाई वाले बिन्दुओं को मिलाते हुए समोच्च रेखाएँ बना दी जाती हैं। समान अन्तराल न होने की दशा मे अन्तर्वासना (interpolation) के द्वारा समोच्च रेखाएं पूर्ण करत है। समोच्च रेखाएं बनाने की इस विधि को उच्चावच-निरूपण के अध्याय में समझाया गया है।
समोच्च रेखण की विधियाँ
(Methods of Contouring)
समोच्च रेखण की क्षेत्र-विधियों (field-methods) को दो भागों में बाँटा जा सकता है-(i) प्रत्यक्ष विधियां (direct methods) तथा (ii) अप्रत्यक्ष विधियां (indirect methods)। इन विधियों के कुछ प्रमुख भेदों को नीचे लिखा गया है।
समोच्च रेखण की प्रत्यक्ष विधियाँ
(Direct methods of contouring)
इन विधियों में प्रत्येक समोच्च रेखा के विभिन्न समोच्च बिन्दुओं की धरातल पर स्थितियाँ निश्चित करते हैं और इसके बाद इन समोच्च-बिन्दुओं (contour points) या स्थानिक ऊँचाइयों (spot heights) को प्लेन टेबल अथवा किसी अन्य सर्वेक्षण उपकरण की सहायता से प्लान में अंकित करके समोच्च रेखाएं बनाते हैं। इस प्रकार समोच्च रेखण की प्रत्यक्ष विधियों में प्रत्येक समोच्च रेखा को धरातल पर अनुरेखित करके प्लान में स्थानान्तरित करते हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष विधियों के द्वारा समोच्च राखी बनाने में अपेक्षाकृत अधिक समय एवं श्रम की आवश्यकता होती है परन्तु शुद्धता के विचार से इन विधियों को सर्वोत्तम माना जाता है। अत: परिशुद्ध समोच्च रेखण एवं छोटे-छोटे क्षेत्रों के समोच्च रेखी मानचित्र बनाने के लिये प्रत्यक्ष विधियों का प्रयोग बहुत उपयोगी रहता है।
समोच्च रेखण की प्रत्यक्ष विधियों के मुख्य भेद नीचे दिये गये हैं।
1. अनरेख-समोच्च रेखा विधि (Trace-contour method)-इस विधि में निम्न प्रकार कार्य करते हैं :
(1) दिये गये क्षेत्र का भली-भाति निरीक्षण करके किसी उपयुक्त स्थान A, जहाँ से पर्याप्त दूरी तक चारों ओर का क्षेत्र स्पष्ट दिखलाई देता हो, पर डम्पी लेवल को समतल स्थापित कीजिये ।
(2) किसी समीपवर्ती स्थायी बेन्च मार्क पर पश्चदृष्टिपात करके सर्वेक्षण क्षेत्र के समीप एक अस्थायी बेन्च मार्क स्थापित कीजिये । मान लीजिये इस अस्थायी बेन्च मार्क का समानीत तल 100 मीटर है।
(3) इस अस्थायी बेन्च मार्क पर तलेक्षण मापी दण्ड रखकर पाठ्यांक पढ़िये । मान लीजिये यह दण्ड पाठ्यांक 1.5 मीटर है तो A स्टेशन पर संधान तल या उपकरण की ऊंचाई 100 + 1.5 = 101.5 मीटर हुई।
(4) अब यदि 1 मीटर के अन्तराल पर समोच्च रेखाएँ बनानी हैं तो स्पष्ट है कि 9899100 व 101 मीटर की समोच्च रेखाओं के लिये क्षेत्र में ऐसे बिन्दुओं को ढूंढा जायेगा, जिनके दण्ड पाठ्यांक क्रमश: 101.5-98 =3.5, 101.5-99 = 251015100 = 1.5 तथा 1015101 = 0.5 मीटर हों।
(5) इस विधि में एक समय में केवल एक समोच्च रेखा की क्षेत्र में स्थिति ज्ञात की जाती है। अत: 98 मीटर की समोच्च रेखा के बिन्दुओं को ढूंढने के लिये पहले दण्ड-वाहक अनुमान से किसी स्थान पर तलेक्षण मापी दण्ड को रखेगा। इसके बाद यन्त्रवाहक दूरबीन में देखकर दण्ड वाहक को ढाल पर इतना ऊपर या नीचे की ओर हटने का संकेत करेगा कि दण्ड पाठ्यांक ठीक 3.5 मीटर हो जाये। अब दण्डवाहक अपने स्थान पर खड़िया से निशान लगाकर अथवा खूंटी गाड़कर इसी पाठ्यांक वाले क्षेत्र के अन्य बिन्दुओं को बारी-बारी से चिह्नित करेगा। इस प्रकार निश्चित किये गये बिन्दुओं की संख्या जितनी अधिक होगी उतना ही समोच्च रेखा कार्य अधिक शुद्ध होगा।
(6) उपरोक्त विधि की पुनरावृत्ति करते हुए बारी-बारी से शेष समोच्च रेखाओं के बिन्दुओं की क्षेत्र में स्थितियाँ ज्ञात कीजिये।
(7) अब प्लेनटेबुल आदि के द्वारा इन समोच्च बिंदुओं को क्षेत्र के प्लान में अंकित कीजिये तथा समान समानीत तल वाले बिन्दुओं को वक्राकार रेखाओं के द्वारा मिलाकर 98, 99, 100 व 101 मीटर की समोच्च रेखाएं पूर्ण कीजिये।
(8) A स्टेशन पर कार्य समाप्त करने के पश्चात् डमपी लेविल को ऊँचाई अथवा नीचाई की ओर किसी अगले स्टेशन B पर रखिये जिससे आगे की समोच्च रेखाएं बनाई जा सके।
(9) B स्टेशन पर डम्पी लेवल को सही सही समतल करने के पश्चात् पूर्ववर्ती स्टेशन से प्रेक्षित किसी समोच्च बिन्दु पर पश्चदृष्टिपात करके दण्ड पाठ्यांक पढ़िये । मान लीजिये यह दण्ड पाठ्यांक 3.5 मीटर है। अब यदि दण्ड-स्टेशन का समानीत तल 101 मीटर है तो B स्टेशन पर संधान तल की ऊँचाई 101 +3.5 = 104.5 मीटर होगी तथा इस स्टेशन से प्रेरित 2.5, 1.5 व 0.5 मीटर पाठ्यांक वाले समोच्च बिन्दु क्रमश: 102, 103 व 104 मीटर की समोच्च रेखाओं पर स्थित होंगे।
(10) अब पहले बतलाई गई विधि के अनुसार इन समोच्च । रेखाओं को क्षेत्र में ज्ञात करके प्लान में अंकित कीजिये। इस प्रकार निरन्तर आगे बढ़ते हुए समस्त क्षेत्र का समोच्च रेखी मानचित्र पूर्ण कर लिया जाता है।
2. समोच्च रेखण की अरीय रेखा विधि (Radial line method of contouring) - छोटे-छोटे क्षेत्रों, विशेषकर जिनमें कोई पहाड़ी स्थित होती है, के समोच्च रेखी मानचित्र बनाने के लिये यह विधि बहुत उपयोगी रहती है। इस विधि के अनुसार निम्न प्रकार कार्य करते हैं:
(1)पहाड़ी के शीर्ष क्षेत्र में कोई उभयनिष्ठ बिन्दु p चुनिए तथा वहाँ से चारों ओर को आवश्यकतानुसार संख्या में PA, PB, PC, PD, PE, PE PG व PH अरीय रेखा (radial lines) निश्चित कीजिये। ये अरीय रेखा ढाल की दशा को ध्यान में रखकर सर्वाधिक उपयोगी दिशाओं में खींची जानी चाहिएँ (चित्र)। प्रत्येक अरीय रेखा का चुम्बकीय दिक्मान पढ़कर क्षेत्र-पुस्तिका में लिखिए ।
(2) P बिन्दु पर डम्पी लेवल को समतल स्थापित करके पहले बतलायी गई विधि के अनुसार संधान तल की ऊँचाई ज्ञात कीजिये। मान लीजिये यह ऊंचाई 300.5 मीटर है।
(3) अब यदि 1 मीटर के अन्तराल पर समोच्च रेखाएं बनानी हैं तो स्पष्ट है कि 300299298 व 297 मीटर की समोच्च रेखाओं पर दण्ड पाठ्यांकों के मान क्रमशः 0.5, 1.5, 2.5 व 3.5 मीटर होंगे।
(4) इसके पश्चात् मंत्र वाहक के निर्देशानुसार दण्ड-वाहक प्रत्येक अरीय रेखा पर चार ऐसे स्थानों पर खूँटियाँ गाड़ेगा जिनके दण्ड पाठ्यांक क्रमशः 0.5, 1.5, 2.5 व 3.5 मीटर हैं।
(5) आगे की समोच्च रेखाएं बनाने के लिये प्रत्येक अरीय रेखा पर आवश्यकतानुसार संख्या में नवीन यन्त्र स्टेशन चुनकर उपरोक्त विधिनुसार समोच्च बिन्दुओं की स्थितियाँ ज्ञात की जायेंगी।
(6) अब इन अरीय रेखाओं को उनके चुम्बकीय दिक्मानों के अनुसार प्लान में अंकित कीजिये तथा खूँटियों के बीच की क्षैतिज दूरियों को प्लान में सम्बन्धित अरीय रेखा पर मापनी के अनुसार चिह्नित कीजिये।
(7) समान समानीत तल वाले चिह्नों को मिलाकर समोच्च रेखा बनाइये।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इस विधि में समस्त समोच्च बिन्दुओं की अरीय रेखाओं पर स्थितियाँ ज्ञात की जाती है।
(Indirect methods of contouring)
प्रत्यक्ष विधियों की अपेक्षा अप्रत्यक्ष विधियां अधिक सरल होती हैं तथा इनमें समय, धन व श्रम की पर्याप्त बचत होती है। अप्रत्यक्ष विधियों में दिये हुए क्षेत्र में विभिन्न रेखाओं के सहारे-सहारे अथवा उस क्षेत्र में घाटी-रेखा (valley line), कटक रेखा (ridge line), पर्वत शिखरों, गतों (depressions) एवं ढाल परिवर्तन इंगित करने वाले प्रतिनिधि बिन्दुओं के समानीत फलों को ज्ञात करके, सभी प्रेक्षित बिन्दुओं को क्षेत्र के प्लान में अंकित कर देते हैं। तत्पश्चात् इन स्थानिक ऊँचाइयों को किसी उचित समोच्च रेखा अंतराल (contour interval) पर अन्तर्वेशित (interpolate) करके प्लान में समोच्च रेखाएं बना लेते हैं। यहाँ समोच्च रेखण की तीन अप्रत्यक्ष विधियाँ समझायी गई हैं।
1. अनुप्रस्थ परिच्छेदिका विधि (Cross profile method)-मार्ग बनाने के लिये किये जाने वाले सर्वेक्षणों में अनुप्रस्थ परिच्छेदिका विधि को बहुधा प्रयोग करते हैं। इस विधि में किसी घाटी रेखा, कर्क रेखा, सड़क, रेलमार्ग अथवा नहर के लिये चुनी गई माला रेखा (यहाँ AB) पर प्रारम्भ से अन्त तक थोड़ी-थोड़ी दूर के अन्तर पर अनुप्रस्थ-परिच्छेद रेखा (cross section lines) निश्चित करके इन परिच्छेद रेखाओं के सहारे-सहारे ढाल के परिवर्तनों को ज्ञात करते हैं (चित्र )। ये परिच्छेद रेखाएँ माला रेखा पर लम्ब अथवा तिर्यक हो सकती हैं तथा इनके बीच की दूरी को धरातल की प्रकृति के अनुसार निश्चित किया जाता है। चित्र 21.24 में 100 मीटर की दूरी के अन्तराल पर परिच्छेद रेखा चुनी गयी हैं। प्रत्येक परिच्छेद रेखा पर ढाल परिवर्तन इंगित करने वाले सभी बिन्दुओं की समुद्र तल से ऊँचाई ज्ञात कर ली जाती है। इसके पश्चात् इन बिन्दुओं को प्लान पर अंकित कर लेते हैं तथा अन्तर्वेशन के द्वारा उचित अन्तराल पर समोच्च रेखाएं बना दी जाती हैं।
2. वर्ग विधि (Square method)-यह विधि छोटे-छोटे क्षेत्रों के समोच्च रेखी मानचित्र बनाने के लिये प्रयोग में लायी जाती है। इस विधि में दिये हुए क्षेत्र को वर्गों में बाँट देते हैं (चित्र 21.25)। ये वर्ग एक-समान अथवा भिन्न-भिन्न आकार वाले हो सकते हैं। सामान्यतः 2 या 2.5 मीटर से लेकर 25 या 30 मीटर तक लम्बी भुजाओं वाले वर्ग बनाये जाते हैं। समतल क्षेत्रों में बड़े-बड़े वर्ग बनाये जा सकते हैं परन्तु ऊँचे-नीचे धरातल वाले भागों में वर्गों का आकार यथासम्भव छोटा रखा जाता है। इसके पश्चात् प्रत्येक वर्ग के प्रत्येक कोने की डम्पी लेवल आदि के द्वारा समुद्र तल से ऊँचाई ज्ञात करते हैं। यदि आवश्यकता हो तो किसी वर्ग के भीतर स्थित बिन्दुओं की ऊँचाइयाँ भी प्रेक्षित की जा सकती हैं। वर्गों के इस जाल को प्लान पर अंकित करके प्रत्येक कोने के समीप उसकी समुद्र तल से ऊँचाई लिख दी जाती है और फिर किसी उचित अन्तराल पर इन ऊँचाइयों का अन्तर्वेशन करके समोच्च रेखाएं खींच देते हैं।
3. टैकीपितीय विधि (Tacheometric method)-किसी पहाड़ी का समोच्च रेखी मानचित्र बनाने के लिये यह विधि विशेष रूप से उपयोगी है। इस विधि में माला रेखा के प्रत्येक यन्त्र-स्टेशन पर चारों ओर को दिये हुए कोणों के अन्तराल पर कुछ अरीय रेखाएँ (radial lines) निश्चित कर देते हैं (चित्र 21.26) । इसके पश्चात प्रत्येक अरीय रेखा पर ढाल परिवर्तन इंगित करने वाले प्रतिनिधि बिन्दुओं के थियोडोलाइट के द्वारा ऊर्ध्वाधर कोण मापे जाते हैं तथा इन बिन्दुओं पर तलेक्षण मापी दण्ड को खड़ा करके डायाफ्राम के ऊपरी, मध्यवर्ती व निचले क्रॉस-तार की सीध में पाठ्यांक पढ़ते हैं। इन प्रेक्षणों के आधार पर प्रत्येक प्रतिनिधि बिन्दु की समुद्र तल से ऊँचाई एवं यन्त्र-स्टेशन से क्षैतिज दूरी ज्ञात करते हैं। क्षैतिज दूरी ज्ञात करने के लिये निचले व ऊपरी क्रॉस-तारों के पाठ्यांकों के अन्तर में 100 की गुणा करते हैं। क्षैतिज दूरी व ऊर्ध्वाधर कोण के टेन मूल्य के गुणनफल में नेत्रिका की ऊँचाई को परिस्थितिनुसार जोड़कर अथवा घटाकर किसी बिन्दु की यन्त्र-स्टेशन से ऊँचाई अथवा नीचाई ज्ञात की जा सकती है। उपरोक्त गणना कार्य के पश्चात् अरीय रेखा विधि के अनुसार सभी प्रेक्षित बिन्दुओं को प्लान में अंकित करके अन्तर्वेशन के द्वारा समोच्च रेखी मानचित्र तैयार कर लिया जाता है ।
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