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भारतीय क्लाइनोमीटर
(Indian Clinometer)
इस क्लाइनोमीटर का आविष्कार भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने किया था, अतः इसे 'भारतीय क्लाइनोमीटर' नाम से पुकारते हैं। भारतीय क्लाइनोमीटर को टेन्जेन्ट क्लाइनोमीटर (Tangent clinometer) भी कहा जाता है। अपेक्षाकृत दूर स्थित बिन्दुओं की ऊँचाइयाँ ज्ञात करने के लिये यह यन्त्र बहुत उपयोगी रहता है। भारतीय क्लाइनोमीटर को प्लेन टेबल पर रखकर प्रयोग करते हैं तथा इसके द्वारा उन्नयन व अवनमन कोणों को मापा जाता है।
[I] भारतीय क्लाइनोमीटर के अंग
(Parts of an Indian clinometer)
जैसा कि नीचे दिए चित्र से स्पष्ट है, भारतीय क्लाइनोमीटर में निम्नलिखित प्रमुख अंग होते हैं :
1. आधार प्लेट (Base plate) - भारतीय क्लाइनोमीटर में सबसे नीचे लगभग 22 सेमी लम्बी एवं 2 सेमी चौड़ी धातु की प्लेट होती है, जिसे आधार प्लेट कहते हैं। इस प्लेट के नीचे हाथी दाँत अथवा धातु के तीन छोटे-छोटे बटन या पैर होते हैं। ये पैर आधार प्लेट को प्लेन टेबुल के कागज़ से थोड़ा ऊपर रखते हैं अतः उपकरण को प्लेन टेबुल पर घुमाने से कागज़ खराब होने से बच जाता है।
2. पीतल की छड़ (Brass bar)- आधार प्लेट के ऊपर पीतल की एक छड़ होती है जिसके मध्य में लेविल नलिका एवं एक सिरे पर समतलन पेंच (levelling screw) लगा होता है। इस खंचित पेंच की सहायता से पीतल की छड़ को समतल किया जाता है। इस छड़ में दो आलंबन (strut) लगे होते हैं, जो कोण मापते समय क्लाइनोमीटर के नेत्र फलक (eye vane) व दृश्य वेधिका (object vane) को लम्बवत् रखते हैं। उपकरण को बन्द करते समय इन आलंबनों को उल्टा घुमाकर आधार प्लेट पर क्षैतिज रख देते हैं ।
3. नेत्र फलक व दृश्य वेधिका (Eye vane and object vane)-पीतल की छड़ के सिरों पर एक दूसरे से लगभग 20 सेमी दूर दो मुड़वाँ फलक (folding vanes) होते हैं। इनमें छोटा फलक, जिसके ऊपरी सिरे के पास अवलोकन-छिद्र (eye-hole) होता है, नेत्र-फलक (eye vane) या दर्श फलक (sight vane) कहलाता है तथा बड़े फलक को दृश्य वेधिका (object vane) कहते हैं । दृश्य वेधिका के मध्य में एक लम्बवत् झिरी (slit) कटी होती है। इस झिरी के बायें किनारे पर अंशों (degrees) के तथा दायें किनारे पर प्राकृतिक टेंजेन्ट (natural tangents) के चिह्न अंकित होते हैं। दोनों किनारों पर मध्य में शून्य के चिह्न होते हैं। शून्य से ऊपर की ओर के चिह्नों पर उन्नयन कोण (angles of elevation) तथा नीचे की ओर के चिह्नों पर अवनमन कोण (angles of depression) पढ़ते हैं। इस प्रकार इस क्लाइनोमीटर पर अधिक से अधिक 22° तथा कम से कम 20 मिनट तक का उन्नयन या अवनमन कोण पढ़ा जा सकता है।
इसी प्रकार दायें किनारे पर अधिक से अधिक 0.4 तथा कम से कम 0.005 टेंजेन्ट मूल्य पढ़ा जा सकता है। इस सम्बन्ध में यह बात उल्लेखनीय है कि दोनों मापनियों के शून्य चिह्न अवलोकन-छिद्र की सीध में होते हैं अर्थात् उपकरण को समतल स्थापित कर देने पर अवलोकन-छिद्र एवं शून्य के चिह्नों को मिलाने वाली कल्पित सरल रेखा पूर्णतः क्षैतिज हो जाती है।
4. सरकवाँ फ्रेम (Sliding frame) - दृश्य वेधिका पर एक फ्रेम लगा होता है, जिसे रैक-पिनियन (rack and pinion) के द्वारा दृश्य वेधिका के सहारे ऊपर या नीचे की ओर खिसकाया जा सकता है। फ्रेम में दृश्य वेधिका की झिरी के आर-पार एक क्षैतिज तार बंधा होता है जिसकी सीध में किसी विवरण को लक्ष्य करके ऊर्ध्वाधर कोण का अंशों या टेंजेन्ट में मान पढ़ते हैं।
[II] भारतीय क्लाइनोमीटर की प्रयोग-विधि
(Method of using the Indian clinometer)
जैसा कि पहले संकेत किया जा चुका है, प्लेनटेबुलन में किसी बिन्दु की यन्त्र-स्टेशन से ऊँचाई अथवा नीचाई ज्ञात करने के लिये प्रायः भारतीय क्लाइनोमीटर को प्रयोग में लाया जाता है। इस उपकरण को प्रयोग करने की विधि बहुत सरल है।
(1) यन्त्र-स्टेशन (मान लीजिये A) पर प्लेन टेबुल को समतल स्थापित कीजिये तथा प्लान में A स्टेशन की स्थिति प्रकट करने वाले बिन्दु (a) पर क्लाइनोमीटर के नेत्र फलक वाले सिरे को रखिये।
(2) दोनों फलकों को लम्बवत् खड़ा करके आलंबन लगाइये जिससे कार्य करते समय कोई भी फलक नत न हो सके।
(3) समतलन पेंच की सहायता से लेविल नलिका के बुलबुले को नलिका के ठीक मध्य में स्थिर कीजिये।
(4) अब रैक-पिनियन से सरकवाँ फ्रेम को इतना ऊँचा खिसकाइये कि अवलोकन-छिद्र पर आँख रखकर देखने से प्रेक्षित किये जाने वाला विवरण (मान लीजिये B बिन्दु) क्षैतिज तार से प्रतिच्छेदित हो जाये । इसके पश्चात् दृश्य वेधिका पर क्षैतिज तार के सामने का चिह्न पढ़िये। यह पाठ्यांक ऊर्ध्वाधर कोण (मान लीजिये a) के टेंजेन्ट मूल्य को प्रकट करेगा।
(5) धरातल से अवलोकन-छिद्र की ऊँचाई तथा A व B के बीच की क्षैतिज दूरी को ज़रीब अथवा फीते से मापिये।
(6) उपरोक्त मानों को निम्न सूत्र में रखिये-
ऊर्ध्वाधर अन्तराल (V.I.),
=क्षैतिज दूरी (H. E.)x टेन a
जैसा कि चित्र से प्रकट है, इस सूत्र को हल करने पर B बिन्दु की अवलोकन-छिद्र से ऊँचाई (YB) ज्ञात होगी। अतः A स्टेशन से B बिन्दु की ऊँचाई ज्ञात करने के लिये YB के मान में अवलोकन-छिद्र की ऊँचाई को जोड़िये।।
यदि A स्टेशन से नीचाई की ओर स्थित किसी बिन्दु C का अवनमन कोण B मापा गया है, तो उपरोक्त सूत्र (V. I. = H. E.X Tan B) को हल करने पर YC का मान ज्ञात होगा, जिससे अवलोकन-छिद्र की ऊँचाई भी सम्मिलित है। अतः A स्टेशन से B बिन्दु की नीचाई ज्ञात करने के लिये YC के मान में से अवलोकन-छिद्र की ऊँचाई को घटाया जायेगा।
[III] दूरस्थ बिन्दुओं की ऊँचाई ज्ञात करना
(Determining the heights of distant points)
जब कोई बिन्दु यन्त्र-स्टेशन से बहुत दूर स्थित होता है अथवा मार्ग में कोई बाधा होने के कारण क्षैतिज दूरी मापने में कठिनाई होती है, तो दो संरेख (collinear) स्टेशनों से पढ़े गये ऊर्ध्वाधर कोणों एवं उन स्टेशनों के बीच की क्षैतिज दूरी के आधार पर दिये हुए बिन्दु की यन्त्र-स्टेशन से ऊँचाई या नीचाई ज्ञात करते हैं। उदाहरणार्थ, मान लीजिये किसी यन्त्र स्टेशन A से दिये हुए बिन्दु B की ऊँचाई ज्ञात करनी है परन्तु मार्ग में तालाब होने के कारण A व B के बीच की क्षैतिज दूरी को सरलतापूर्वक मापना सम्भव नहीं है।
(1) A स्टेशन पर प्लेन टेबुल को समतल स्थापित कीजिये तथा पहले बतलायी गई विधि के अनुसार क्लाइनोमीटर को प्लेन टेबुल पर रखकर B बिन्दु का ऊर्ध्वाधर कोण (a) ज्ञात कीजिये एवं अवलोकन-छिद्र की ऊँचाई मापिये।
(2) A स्टेशन से B की सीध में कुछ दूरी पर कोई दूसरा ऐसा स्टेशन C चुनिये जिसकी ऊँचाई A स्टेशन की ऊँचाई के समान हो। AC दूरी को मापिये।
(3) C स्टेशन पर प्लेन टेबुल को समतल करके उस पर क्लाइनोमीटर को पहले के बराबर ऊँचाई पर रखकर B का पुनः ऊर्ध्वाधर कोण (3) ज्ञात कीजिये।
(4) उपरोक्त मानों को निम्नलिखित सूत्र में रखकर B बिन्दु की ऊँचाई ज्ञात कीजिये:
B विन्दु की ऊँचाई,

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